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15 बच्चों पर 4 शिक्षक, फिर भी स्कूल खाली: देवरुंग मिडिल और प्राइमरी शाला में शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल, भागवत कथा सुनने भेजे गए छात्र!

विजय साहू

बलौदाबाजार।जिले के कसडोल विकासखंड में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कसडोल विकासखंड मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय देवरुंग और शासकीय प्राथमिक शाला देवरुंग में महज 15 छात्रों के लिए 4 शिक्षकों की पदस्थापना की गई है। देवरुंग के शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय में 6 से 8 वीं तक के कक्षा पर मात्र 6 बच्चे है इसके लिए दो शिक्षक पदस्थ किए गए जिसमें राधेश्याम पटेल और गोविंदराम केवर्त्या साथ ही शासकीय प्राथमिक शाला देवरुंग में कक्षा 1 से 5 वीं तक 9 बच्चों के लिए दो शिक्षक पदस्थ किए गए हैं जिसमें सुनील कुमार सहायक शिक्षक और दिव्या देवांगन सहायक शिक्षक है। और दोनों स्कूल को मर्ज कर संचालित किया जा रहा है। जबकि शासन की नियमानुसार आरटीई अधिनियम, 2009 के अनुसार, प्राथमिक शाला में (कक्षा 1-5) में 30 बच्चों पर 1 शिक्षक (30:1) और पूर्व माध्यमिक शाला (कक्षा 6-8) में 35 बच्चों पर 1 शिक्षक (35:1) का अनुपात अनिवार्य है। इसके तहत, 60 तक बच्चों के लिए 2 शिक्षक, 61-90 के लिए 3, और 91-120 के लिए 4 शिक्षक व 150 से अधिक पर 5 शिक्षक व 1 हेडमास्टर अनिवार्य हैं। शासन के गार्डलेन को दरकिनार करते हुए विकासखंड शिक्षा अधिकारी अरविंद ध्रुव ने नियम विरुद्ध शिक्षकों को पदस्थ किया गया।

जबकि विकासखंड के कई अन्य स्कूल ऐसे हैं जहां सौ से अधिक छात्र पढ़ते हैं, लेकिन वहां केवल 1 से 2 शिक्षक ही पदस्थ हैं। इस असंतुलित व्यवस्था ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार देवरुंग मिडिल स्कूल और प्राइमरी स्कूल में छात्रों की दर्ज संख्या केवल 15 है, इसके बावजूद यहां वर्षों से 4 शिक्षक पदस्थ हैं। वहीं दूसरी ओर कसडोल विकासखंड के कई स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। जिन स्कूलों में छात्रों की संख्या अधिक है, वहां के प्रधानपाठक और शिक्षक लंबे समय से अतिरिक्त शिक्षकों की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांगों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

 13 मार्च 2026 को जब कुछ पत्रकार इस पूरे मामले की सच्चाई जानने के लिए देवरुंग स्कूल पहुंचे, तो वहां का नजारा और भी चौंकाने वाला था। स्कूल परिसर में एक भी छात्र मौजूद नहीं था और दो शिक्षक भी अनुपस्थित मिले। जब पत्रकारों ने इस संबंध में स्कूल प्रधानपाठक राधेश्याम पटेल से जानकारी लेनी चाही, तो उन्होंने न केवल सवालों से बचने की कोशिश की बल्कि पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार करते हुए उन्हें वहां से जाने के लिए कह दिया।

प्रधानपाठक ने सफाई देते हुए कहा कि गांव में चल रही भागवत कथा सुनने के लिए बच्चे वहां गए हैं। यह बात अपने आप में कई सवाल खड़े करती है, क्योंकि जिस समय स्कूल में बच्चों की पढ़ाई होनी चाहिए, उस समय उन्हें धार्मिक कार्यक्रम में भेजना शिक्षा व्यवस्था की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। स्थानीय लोगों से जानकारी लेने पर यह भी पता चला कि भागवत कथा का कार्यक्रम दोपहर 1 बजे के बाद शुरू होता है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार स्कूल के शिक्षक अपनी मनमर्जी से स्कूल आते-जाते हैं। कई बार बिना सूचना के छुट्टी कर देते हैं और अक्सर शिक्षक स्कूल से अनुपस्थित रहते हैं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि स्कूल के प्रधानपाठक स्वयं भी कभी-कभार ही स्कूल आते हैं और उनका व्यवहार भी ठीक नहीं बताया जाता।

कसडोल विकासखंड के अधिकांश स्कूल वन क्षेत्र में स्थित हैं और दूर-दराज होने के कारण अधिकारियों का दौरा भी बहुत कम हो पाता है। इसी स्थिति का फायदा उठाकर कई शिक्षक मनमानी करते हैं। स्थानीय लोग इसे “जंगल में मोर नाचा किसने देखा” वाली कहावत से जोड़कर देखते हैं, क्योंकि दूरस्थ क्षेत्र होने के कारण निगरानी लगभग नाममात्र की रह गई है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कई स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है तो आखिर 15 छात्रों के लिए 4 शिक्षकों की पदस्थापना क्यों की गई? क्या यह केवल कागजी व्यवस्था है या फिर इसके पीछे कोई और कारण है? यह भी जांच का विषय है कि इतने कम बच्चों वाले स्कूल में इतने वर्षों से अतिरिक्त शिक्षक क्यों बने हुए हैं, जबकि जरूरतमंद स्कूलों में शिक्षक भेजे जा सकते थे।

कई स्कूलों के शिक्षक और शिक्षा से जुड़े लोग दबी जुबान में इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जहां शिक्षकों की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां शिक्षकों का स्थानांतरण या अस्थायी व्यवस्था के तहत भेजा जाना चाहिए ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।

अब सबसे बड़ा सवाल कसडोल के विकासखंड शिक्षा अधिकारी अरविंद ध्रुव की भूमिका को लेकर उठ रहा है। क्या वे इस मामले में गंभीरता से जांच कर कार्रवाई करेंगे या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?

यदि समय रहते इस पूरे मामले की जांच नहीं हुई तो यह न केवल शिक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलता मानी जाएगी बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के भविष्य के साथ भी बड़ा खिलवाड़ साबित होगा। अब देखना यह होगा कि बलौदाबाजार कलेक्टर और शिक्षा विभाग इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई करते हैं।

इस सम्बन्ध में जानकारी लेने के लिए विकासखंड शिक्षा अधिकारी अरविंद ध्रुव से सम्पर्क करना चाहा लेकिन संपर्क नहीं हो पाया।


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